- डॉ. श्रीकृष्ण “जुगनू”
लोक सबसे महत्वपूर्ण है। लोकतत्त्व का स्वरूप है। शास्त्र लोक को तत्त्वत: प्रतिष्ठित करते हैं। शास्त्र क्या है? लोक के सुविचारित और सर्वोपयोगी स्वरूप हैं जिनको लोक के ही अंगीभूत मनीषी और सृजनदक्ष सृजित करते हैं और लोकहित में समर्पित करते हैं। यह सृजन अहंकार और स्व को विस्मृत करके कुछ इतना भी हुआ है कि सृजित हुए ग्रंथ ऋषि, महर्षियों के नाम हो गए जबकि ऋषि काल और सृजन काल में बहुत अंतर होता है। लोकसाहित्य की सबसे बड़ी विशेषता ही यही है कि उसमें रचनाकार नहीं, आवसरिकता और उपयोगिता प्रधान होती है। रचनाकार यही भाव रखता है कि उसमें उसका कुछ नहीं। शास्त्र के विषय में भी यही कुछ है।
लोक ने अपने स्वर, अपने अनुभव और मनोभाव मणि रूप में संजोकर रखे हैं कि वे मंत्र होकर भाषा के भूषण बने। उनको लोक ने ही सर्वोपरि सम्मान दिया और अपना हियहार बनाया। वेद, वेदांग, उपनिषद्, सूत्र, स्मृति और पुराण ही नहीं, संहिताओं में लोकस्वर की ही प्रभुता है लोक का परम स्वरूप है। शाखाओं के रूप में जो भी शास्त्र सृजित हुए, उनमें लोक की शब्दावली ही ढली है। इसके मानक स्वरूप के लिए व्याकरण बने। पाणिनि ने लोक से ही शब्दों को चुना तो पतंजलि ने लोकोदाहरण से उनको विवेचित किया। लोक से पृथक् कौन और क्या हो सकता है!
